
भास्कर की पत्रिका अहा ज़िन्दगी में चल रहे अपने कॉलम ग्लोबल चलचित्र से
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ, किसी मुद्दे पर आप सच कह रहे हों, सामने वाला भी और दोनों बातें सिरे से अलग हों? सच निरपेक्ष नहीं है, कोई शाश्वत सत्य नहीं होता, सब का अपना-अपना जीवन, अपनी परिस्थितियां हैं, अपने विश्वास, मान्यताएं और हर एक का अपना सच भी। महान जापानी फ़िल्मकार अकिरा कुरोसोवा ने इसी बात की डोर पकड़ एक ख़ूबसूरत फ़िल्म बुन दी--रोशोमन, जिसने पूरी दुनिया में चमत्कारिक सराहना के परचम ही नहीं लहलहाए, अपनी फ़िल्मों पर अकड़े पश्चिम ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तबाह जापान की संस्कृति को गर्दन झुका के, घुमा के गौर से देखा। समुराई पृष्ठभूमि के अकिरा कुरोसोवा का फ़िल्मों में प्रवेश आकस्मिक ही था। वे तो चित्रकार बनना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों ने पहले जीने की जद्दोजहद का इंतज़ाम करने की मांग की और वे 1936 में फ़िल्मों के सहायक निर्देशक हो गए।
1943 में उनकी पहली निर्देशित फ़िल्म आई--जुडो सागा, फिर कई श्रेणियों की फ़िल्में बनाने के बाद रोशोमन, जो अकेले ही कुरोसावा को विश्व के महान निर्देशकों की पहली पंक्ति में बिठाने के लिए काफी थी। इसके बाद सेवेन समुराई, इकिरू, माद्योदा जैसी कितनी ही फ़िल्में दुनिया के सामने मील का पत्थर बनकर आईं। 1950 में रजत पट पर आई रोशोमन। जापानी लोककथा-लोक नाट्य शैली की सुगंध लिए यह पहली फ़िल्म थी, जिसने दुनिया को जापान की संस्कृति और कला के बारे में चेताया। यूं तो, रोशोमन एक मर्डर मिस्ट्री कही जा सकती है, लेकिन वह तो बस कहानी का गुंथाव है, जिसके सहारे जीवन के कई दार्शनिक सवालों की गुत्थी तक फ़िल्म पहुंची।
एक दोपहर कब्र पर एकत्र लकड़हारा, पादरी और एक व्यक्ति किसी सत्य घटना की किस्सागोई करते हैं। न जाने कितनी कहानियाँ जंगल के सुनसान राहों पर भटकती बनती हैं जंगल और कहानी का रिश्ता पुराना है इस किस्से में भी ...जंगली रास्तों से गुजरते एक समुराई दम्पति हैं और डाकू भी । नव दंपति को रास्ते में डाकू लूट लेते हैं। समुराई का क़त्ल किया जाता है और पत्नी का बलात्कार। जिस तलवार से समुराई का कत्ल हुआ है, वह गायब। अदालत में घटना के चार गवाह हैं--डाकू, विवाहिता, समुराई की आत्मा और घटनास्थल पर मौजूद एक लकड़हारा।
डाकू के हिसाब से समुराई को उसने द्वंद्वयुद्ध में हराकर मारा और जाने वो कीमती तलवार वहां कैसे छूट गई, विवाहिता के हिसाब से उसने बलत्कृत होने के बाद शर्मसार हो खुद को उस तलवार से मारना चाहा, लेकिन तलवार हाथ में लिए-लिए ही वो बेहोश हो गई और जब जगी, तब समुराई मृत था और तलवार जाने कहां! समुराई एक माध्यम से अपना बयान देता है कि बलत्कृत होने के बाद डाकू के साथ चलने की प्रस्तुति पर उसकी पत्नी ने कहा कि वो डाकू के साथ चलने को तैयार है, यदि वो समुराई का कत्ल कर दे। यह सब सुन समुराई ने खुद ही अपनी तलवार से खुद को मार डाला पर उसे यह नहीं पता कि उसके मरने के बाद तलवार किसने उठाई। अब लकड़हारा अदालत को बताता है कि समुराई की कहानी झूठी है। दरअसल, डाकू ने स्त्री से विवाह की भीख मांगी, जिसके लिए स्त्री राज़ी नहीं थी। तय हुआ कि दोनों मर्द स्त्री का प्यार जीतने के लिए द्वंद्व करें, लेकिन समुराई स्त्री की खातिर लड़ना चाहता ही नहीं था, फिर भी वे लड़े। लड़ाई के दौरान पत्नी बेहोश हो गई। डाकू की जीत हुई, लेकिन स्त्री भाग गई और वह विजित तलवार लेकर चला गया। अंत में पता चलता है कि तलवार की चोरी लकड़हारे ने की थी और सभी अपने-अपने बचाव, मान्यताओं और पूर्वाग्रहों के कारण अपने मतलब से गढ़ी हुई कहानियां सुना रहे थे।26 दिसंबर, 1951 को रिलीज़ इस फिल्म ने सात अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जिसमें से एक सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म के लिए मिला ऑस्कर भी शामिल है।
मैं एक सच की बात कहूं? सच! ये फ़िल्म सच्ची क्लासिक है, जो हर जीवन की गुत्थी में जवाब बन कर शामिल है।