Friday, September 26, 2008


काबुको से निकल कर
फिर गिरफ्त तेरी ढूंढा किए
ना उड़ पाने की घुटन में जिया किए
तन्हा उड़ान की उचाईयो से डरा किए
...नि.

2 comments:

चण्डीदत्त शुक्ल said...

आज आपके ब्लॉग पर यूं ही चला गया...मेरे ब्लॉग और फिर चवन्नीछाप की पोस्ट पर की गई आपकी टिप्पणियों से उत्सुकता जागी थी...और यहां आकर लगा-अच्छा हुआ, जो चला आया. एकदम सच, खालिस सच...इतनी सारी सच्चाई कहां से लाती हैं आप? कोई बनावट नहीं, लफ्जों की बेवजह, कसरतन की गई, कदरन खीझ पैदा करने वाली बुनावट भी नहीं...देखिए, लगातार बदसूरत होती जा रही इस दुनिया में कुछ अच्छा, राहत देने वाला और खूबसूरत सोचने वाले लोग अब नहीं हैं...आप हैं, तो ये हम सबके लिए आश्वस्ति देने वाला है...राहत की बात है...आपके नेचुरल होने, सच्चे होने और उससे भी बड़ी बात, अलमस्त होने को हमारा सलाम...देखिए, इंसान होने के बाद कुछ और बन पाएं, या नहीं,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इंसानों की दुनिया में खोती जा रही इंसानियत आप जैसों से ही जिंदा है. आप मुझे पुरुषवादी न समझें, मैं तो इसे ये हुई न मर्दों वाली बात ही कहूंगा...
खैर, आपकी तारीफ कुछ ज्यादा ही हो गई...अपच हो जाए, तो दो-चार निंदक ढूंढ़ लीजिएगा...अब बात आपके ब्लॉग की पोस्टों पर...देखिए, पहली पोस्ट में आलिंगन में जकड़े रहने और उड़ने को लेकर जो द्वंद्व है, वह स्वाभाविक है। लोग अपनत्व भी पाना चाहते हैं और उड़ान भी, आजादी भी और गुलामी (प्रेम) भी...यही तो प्रेम है. इससे घबराने की जरूरत नहीं.
दूसरी पोस्ट...मास्टर मदन अब नहीं मिलते...आजकल तो छोटे-छोटे बच्चे मां-बहन की गालियां देते हैं..उनका बचपन हमने छीन लिया है...विरासत कहां से मिले उन्हें...
तीसरी पोस्ट...कमाल की है...इलाकावाद के आरोपों से न डरें...अरे भाई, जो अपने वतन, मिट्टी और शहर (जहां जन्मा, बढ़ा) की तारीफ नहीं कर पाएगा, वो सारी दुनिया-जहान को लगाव की सीख क्या देगा? मेरी तरफ से तो आपको, आपके ब्लॉग्स को हंड्रेड़ परसेंट नंबर और तारीफ...लगे रहो डियर...

आशीष said...

r u from Jaipur>?? great...

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